लोकतंत्र का विस्तार: पिछले सौ वर्षों में दुनिया के अधिक से अधिक देशों में लोकतंत्र का विकास और विस्तार हुआ है।
- चुनौतियां और संघर्ष: वर्तमान समय में भी कई देशों को लोकतंत्र बनाए रखने में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। लोगों को अपने देशों में लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित करने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ा है।
- लोकतंत्र की समाप्ति और पुनर्स्थापना: इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ लोकतांत्रिक व्यवस्था को समाप्त किया गया और फिर उसे दोबारा स्थापित (पुनर्स्थापना) किया गया।
- क्षेत्रीय उदाहरण: आधुनिक विश्व में लोकतंत्र के स्वरूप को समझने के लिए दक्षिण अमेरिकी महाद्वीप के उदाहरणों का भी उल्लेख किया गया है।
- चिली में सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना: आयेंदे नामक व्यक्ति ने चिली में सोशलिस्ट पार्टी की नींव रखी थी.
- 1970 का चुनाव: आयेंदे ने ‘पॉपुलर यूनिटी’ नामक गठबंधन का नेतृत्व किया और 1970 में चिली के राष्ट्रपति निर्वाचित हुए.
- सामाजिक सुधार कार्यक्रम: राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने कई सुधार किए, जिनमें बच्चों को मुफ्त दूध बाँटना और भूमिहीन किसानों को जमीन देना शामिल था.
- विदेशी कंपनियों का विरोध: आयेंदे ने चिली के ताँबा जैसे प्राकृतिक संसाधनों को देश से बाहर ले जाने वाली विदेशी कंपनियों का कड़ा विरोध किया.
- सुधारों का विरोध: चिली के चर्च, ज़मींदार वर्ग, अमीर लोगों और कुछ राजनीतिक दलों ने आयेंदे के सुधारों का विरोध किया और उनके विरुद्ध षडयंत्र रचा.
- 11 सितम्बर, 1973 का तख्तापलट: इस दिन नौसेना के एक समूह ने चिली के एक प्रसिद्ध बंदरगाह पर कब्ज़ा कर लिया और रक्षा मंत्री को गिरफ्तार कर लिया गया.
- आयेंदे का अंतिम संदेश: जब सेना ने उनसे इस्तीफा माँगा, तो उन्होंने इनकार कर दिया और रेडियो के माध्यम से देश के नाम अपना अंतिम संदेश दिया, जिसमें उन्होंने एक बेहतर समाज की रचना के प्रति अपना अटूट विश्वास व्यक्त किया.
- सल्वाडोर आयेंदे की हत्या: 11 सितम्बर, 1973 को जनरल ऑगस्टो पिनोशे के नेतृत्व में विद्रोही सैनिकों ने अमेरिकी सरकार के सहयोग से चिली की सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया और राष्ट्रपति आयेंदे की हत्या कर दी।
- सैनिक तख्तापलट: 11 सितम्बर, 1973 की इस घटना को ‘सैनिक तख्तापलट’ कहा जाता है।
- जनरल पिनोशे का शासन: तख्तापलट के बाद जनरल ऑगस्टो पिनोशे देश के राष्ट्रपति बने और उनकी सैनिक सरकार ने चिली में 17 वर्षों तक शासन किया।
- दमन और अत्याचार: पिनोशे की सरकार ने लोकतंत्र की माँग करने वालों और आयेंदे के समर्थकों का दमन किया, उनकी हत्याएँ करवाईं और आयेंदे के परिवार को जेल में डाल दिया। इस दौरान बड़ी संख्या में लोग लापता भी हुए।
- लोकतंत्र की पुनर्स्थापना: पिनोशे का शासन 1988 में समाप्त हुआ जब उन्होंने जनमत संग्रह कराने का फैसला किया। चिली की जनता ने भारी बहुमत से उनकी सत्ता को ठुकरा दिया, जिससे देश में लोकतंत्र की पुनर्स्थापना हुई।
- चिली में लोकतंत्र की स्थिति
- चुनावी इतिहास: चिली में अब तक चार बार चुनाव हो चुके हैं, जिनमें विभिन्न राजनीतिक दलों ने भाग लिया और सरकारें बनाईं।
- सेना की भूमिका: वर्तमान में चिली के शासन में सेना की भूमिका पूरी तरह समाप्त हो चुकी है।
- मिशेल बैशले का निर्वाचन: जनवरी 2006 में चिली के पूर्व वायुसेना प्रमुख अल्बर्टो बैशले की पुत्री मिशेल बैशले राष्ट्रपति चुनी गईं।
- लोकतांत्रिक राष्ट्र: आज चिली एक लोकतांत्रिक देश है, जहाँ लंबे संघर्ष के बाद लोकतंत्र की स्थापना हुई है।
- पोलैंड में लोकतंत्र हेतु संघर्ष
- साम्यवादी शासन: 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में पोलैंड में ‘जारूजेल्स्की’ के नेतृत्व में ‘पोलिश यूनाइटेड वर्कर्स पार्टी’ का शासन था, जो सोवियत संघ समर्थित साम्यवादी शासन का हिस्सा था।
- राजनीतिक पाबंदी: पोलैंड में उस समय किसी अन्य राजनीतिक दल को राजनीति में भाग लेने की अनुमति नहीं थी।
- 14 अगस्त 1980 की घटना: पोलैंड के ‘गडास्क’ शहर में स्थित ‘लेनिन जहाज कारखाना’ के मजदूरों ने हड़ताल कर दी।
- हड़ताल का कारण: इस हड़ताल का मुख्य कारण एक क्रेन चालक महिला को गलत ढंग से नौकरी से निकाला जाना था, जिसकी बहाली की मजदूर माँग कर रहे थे।
- पोलैंड में आंदोलन और ‘लेक वालेशा‘ का उदय
- हड़ताल का नेतृत्व: लेनिन जहाज कारखाने से एक क्रेन चालक महिला को गलत ढंग से नौकरी से निकाले जाने के बाद इलेक्ट्रीशियन, ‘लेक वालेशा‘, हड़ताली कर्मचारियों का नेता बनकर उभरे।
- हड़ताल की वैधानिकता: साम्यवादी शासन में आधिकारिक संगठनों के अलावा किसी अन्य मजदूर संघ को हड़ताल की अनुमति नहीं थी, इसलिए इस हड़ताल को गैर–कानूनी घोषित कर दिया गया।
- मजदूरों की मुख्य माँगें: हड़ताली मजदूरों ने सरकार के सामने तीन प्रमुख माँगें रखीं:
- देश में स्वतंत्र मजदूर संघ को मान्यता दी जाए।
- राजनैतिक बंदियों को रिहा किया जाए।
- प्रेस पर लगी सेंसरशिप हटाई जाए।
- गडास्क संधि और ‘सॉलिडैरिटी‘ का गठन
- गडास्क संधि: आंदोलन की लोकप्रियता के कारण सरकार को झुकना पड़ा और लेक वालेशा के नेतृत्व में मजदूरों के साथ एक 21 सूत्री समझौता हुआ, जिसे ‘गडास्क संधि’ कहा जाता है।
- सॉलिडैरिटी (Solidarnosc): इस संधि के बाद एक नया स्वतंत्र मजदूर संघ बना जिसे ‘सॉलिडैरिटी‘ नाम दिया गया। यह किसी साम्यवादी देश में बना पहला स्वतंत्र मजदूर संघ था।
- व्यापक विस्तार: एक वर्ष के भीतर ही पूरे देश में इसकी शाखाएँ खुल गईं और इसकी सदस्य संख्या एक करोड़ के करीब पहुँच गई।
- 1988 का संकट और सत्ता परिवर्तन
- आर्थिक गिरावट: 1988 तक पोलैंड की अर्थव्यवस्था में भारी गिरावट आने लगी और साम्यवादी सरकार के कुप्रबंधन एवं भ्रष्टाचार के मामले सामने आने लगे।
- दोबारा हड़ताल: 1988 में लेक वालेशा के नेतृत्व में फिर से हड़तालें शुरू हुईं।
- सरकार का संकट: सोवियत संघ से मदद का भरोसा न होने और जन दबाव के कारण जनरल जारूजेल्स्की के नेतृत्व वाली सरकार के सामने गहरा संकट पैदा हो गया।
- आंदोलन और समझौते
- लेख वालेशा (Lech Walesa) के नेतृत्व में मजदूरों ने सरकार के साथ 21 सूत्री समझौता किया जिसे ‘ग्डांस्क संधि‘ के नाम से जाना जाता है।
- इस संधि के बाद ‘सॉलिडेरनोस्क‘ (सॉलिडेरिटी) नामक एक नया स्वतंत्र मजदूर संगठन बना।
- यह पहली बार था जब किसी साम्यवादी (Communist) शासन वाले देश में एक स्वतंत्र मजदूर संगठन का जन्म हुआ था।
- एक वर्ष के भीतर ही ‘सॉलिडेरिटी’ की सदस्य संख्या लगभग एक करोड़ तक पहुँच गई थी।
- संघर्ष और बदलाव
- 1988 में लेख वालेशा के नेतृत्व में फिर से हड़ताल हुई क्योंकि पोलैंड की अर्थव्यवस्था गिर रही थी और सरकार में भ्रष्टाचार बढ़ रहा था।
- हजारों सॉलिडेरिटी सदस्यों को जेल में डाल दिया गया और उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीन ली गई थी।
- अंततः 1989 में सरकार और लेख वालेशा के बीच फिर से समझौता हुआ, जिसके बाद पोलैंड में बहुदलीय स्वतंत्र चुनाव कराए गए।
- लोकतांत्रिक जीत
- सॉलिडेरिटी पार्टी ने सीनेट की 99 सीटों पर जीत हासिल की।
- अक्टूबर 1990 में पोलैंड में राष्ट्रपति पद के लिए पहली बार चुनाव हुए।
- लेख वालेशा भारी बहुमत के साथ पोलैंड के पहले निर्वाचित राष्ट्रपति बने।
- चिली में लोकतंत्र और तख्तापलट:
- साल्वाडोर आयेंदे की सरकार: चिली में आयेंदे की लोकतांत्रिक सरकार आम जनता के बीच लोकप्रिय थी क्योंकि उन्होंने लोगों की भलाई के लिए कई सुधारात्मक कार्यक्रम चलाए थे।
- 11 सितंबर, 1973 का तख्तापलट: इस दिन के बाद बनी सरकार अलोकतांत्रिक थी, जिसका मुख्य उद्देश्य अमीरों के हितों की रक्षा करना था।
- लोकतंत्र की बहाली: चिली में 1988 में हुए जनमत संग्रह के बाद लोकतंत्र की पुनर्स्थापना हुई।
- पोलैंड का शासन (1980 का दशक):
- पोलैंड की साम्यवादी (Communist) सरकार अलोकतांत्रिक थी, जिसका नेतृत्व जनरल जारूजेल्स्की कर रहा था।
- 1990 में लेख वालेशा के नेतृत्व में बनी सरकार पिछली सरकार से भिन्न थी क्योंकि वह एक चुनी हुई (निर्वाचित) सरकार थी।
- चिली और पोलैंड की अलोकतांत्रिक सरकारों के बीच अंतर:
- शासन का स्वरूप: चिली में सैनिक शासन (पिनोशे का शासन) था, जबकि पोलैंड में एक ही पार्टी (साम्यवादी पार्टी) का शासन था।
- दावा: पोलैंड की सरकार यह दावा करती थी कि वह मजदूर वर्ग की ओर से शासन चला रही है, जबकि चिली के शासक पिनोशे ने ऐसा कोई दावा नहीं किया था।
- तानाशाही का प्रकार: पोलैंड का शासन एक मजदूर संगठन की तानाशाही जैसा था, जबकि चिली का शासन सैनिक तानाशाही का उदाहरण था।
- दोनों अलोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में समानताएँ:
- चुनाव की कमी: दोनों ही देशों में लोग अपनी इच्छा से शासकों का चुनाव नहीं कर सकते थे।
- स्वतंत्रता का अभाव: जनता को अपने विचार व्यक्त करने, संगठन बनाने, विरोध करने या राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने की वास्तविक आजादी नहीं थी।
- लोकतंत्र की प्रमुख विशेषताएँ
- जनता की पसंद: लोकतंत्र में ऐसी व्यवस्था होती है कि लोग अपनी मर्जी से अपनी सरकार चुन सकें।
- चुने हुए नेताओं का शासन: देश पर शासन करने का अधिकार केवल उन्हीं नेताओं को होता है जिन्हें जनता ने चुना हो।
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोगों को अपनी बात रखने और विचारों को अभिव्यक्त करने की आज़ादी होती है।
- विरोध का अधिकार: लोगों को सरकार या उसकी नीतियों का विरोध करने की स्वतंत्रता होती है।
- संगठन बनाने का अधिकार: नागरिकों के पास अपने समूह या संगठन बनाने का वैधानिक अधिकार होता है।
- ऐतिहासिक घटनाक्रम और संघर्ष
- लोकतंत्र के लिए संघर्ष: दुनिया के कई हिस्सों में लोकतंत्र की बहाली और उसे दोबारा स्थापित करने के लिए लोगों को काफी लंबा संघर्ष करना पड़ा है।
- सैनिक तख्तापलट: कई देशों में लोकतंत्र स्थापित होने के बाद सेना द्वारा सत्ता पलटने (Military Coup) और सैनिक तानाशाही की स्थापना के उदाहरण भी मिलते हैं।
- उपनिवेशवाद से आज़ादी: सन् 1975 तक दुनिया के कई ऐसे देशों को स्वतंत्रता मिल गई थी जो पहले दूसरे देशों के गुलाम (औपनिवेशिक) थे।
- महत्वपूर्ण वर्ष
- 1950: इस समय के नक्शों में उन देशों को दर्शाया गया है जहाँ लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था थी।
- 1975: इस वर्ष तक कई नए स्वतंत्र राष्ट्रों के उदय के साथ दुनिया के नक्शे में लोकतांत्रिक बदलाव साफ देखे जा सकते थे।
- लोकतंत्र की मुख्य विशेषताएँ
- सरकार का चुनाव: लोकतंत्र में यह व्यवस्था होती है कि लोग अपनी मर्जी की सरकार चुन सकें.
- शासन का अधिकार: केवल लोगों द्वारा चुने गए नेताओं को ही देश पर शासन करने का अधिकार होता है.
- नागरिक स्वतंत्रता: लोकतंत्र में लोगों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होती है.
- विरोध की आज़ादी: लोकतांत्रिक देशों में लोगों को (सरकार का) विरोध करने की आज़ादी होती है.
- संगठन बनाना: नागरिकों के पास संगठन बनाने का अधिकार भी होता है.
- लोकतंत्र का संघर्ष और विकास
- जन संघर्ष: लोकतंत्र की बहाली और उसकी पुनर्स्थापना के लिए लोगों ने काफी संघर्ष किया है.
- सैनिक शासन: कई देशों में लोकतंत्र की बहाली के बाद सैनिक तख्तापलट हुए और सैन्य तानाशाही स्थापित हुई.
- उपनिवेशवाद का अंत: सन् 1975 तक दुनिया के कई औपनिवेशिक देशों को स्वतंत्रता मिल गई थी.
- ऐतिहासिक संदर्भ: पाठ में 1950 और 1975 के समय के नक्शों का संदर्भ दिया गया है जो दुनिया में लोकतांत्रिक शासन की बदलती स्थिति को दर्शाते हैं.
- लोकतंत्र का वैश्विक विस्तार
- 21वीं सदी की शुरुआत: सन् 2000 तक दुनिया के उन देशों में भी लोकतंत्र की स्थापना हो चुकी थी जहाँ पहले यह व्यवस्था नहीं थी.
- समय के साथ बदलाव: किताब में दिए गए नक्शे 1900-1950, 1975 और 2000 के बीच लोकतांत्रिक सरकारों के विस्तार में आए बड़े बदलावों को दर्शाते हैं.
- नक्शों का विश्लेषण
- नक्शा 1.1 (1900 और 1950): यह नक्शा उन चुनिंदा देशों को दिखाता है जहाँ 20वीं सदी के पूर्वार्ध में लोकतांत्रिक सरकारें मौजूद थीं.
- नक्शा 1.2 (1975): यह 1975 के दौरान लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देशों की स्थिति स्पष्ट करता है, जिससे पता चलता है कि लोकतंत्र का दायरा धीरे-धीरे बढ़ रहा था.
- निष्कर्ष
- जैसे-जैसे हम 1900 से 2000 की ओर बढ़ते हैं, दुनिया के नक्शे पर लोकतांत्रिक देशों की संख्या में काफी वृद्धि दिखाई देती है.
- यह दर्शाता है कि लोकतंत्र केवल एक क्षेत्रीय विचार नहीं, बल्कि एक वैश्विक लहर बन चुका है जिसने 21वीं सदी तक आते-आते अधिकांश देशों को प्रभावित किया है.
- लोकतंत्र का विस्तार (सन् 2000)
- वैश्विक प्रसार: नक्शा 1.3 यह दर्शाता है कि सन् 2000 तक दुनिया के एक बहुत बड़े हिस्से में लोकतांत्रिक सरकारें स्थापित हो चुकी थीं.
- असमान विकास: पाठ यह सवाल उठाता है कि क्या आज भी दुनिया के काफी बड़े हिस्से में लोकतंत्र नहीं है, जो यह संकेत देता है कि लोकतंत्र का विस्तार दुनिया के सभी हिस्सों में एक समान नहीं हुआ है.
- अध्ययन का उद्देश्य: “लोकतंत्र के विस्तार के विभिन्न चरण” उपशीर्षक के माध्यम से यह समझने की कोशिश की गई है कि 20वीं सदी में लोकतंत्र की यात्रा कैसी रही और यह विस्तार कब और किन क्षेत्रों में हुआ.
- तालिका के मुख्य स्तंभ: अफ्रीका, एशिया, यूरोप और लातिनी अमेरिका।
- निर्धारित वर्ष: 1950, 1975 और 2000।
- प्राचीन भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था
- ऐतिहासिक प्रमाण: ईसा पूर्व 6ठी शताब्दी में बुद्धकाल के दौरान गंगा घाटी के कई गणराज्यों में लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था के प्रमाण मिलते हैं.
- प्रमुख गणराज्य: इनमें कपिलवस्तु के शाक्य, वैशाली के लिच्छवी, मिथिला के विदेह और कुशीनारा के मल्ल जैसे कई क्षेत्र शामिल थे.
- शासन प्रणाली: गणराज्यों में शासन का प्रधान एक निर्वाचित पदाधिकारी होता था जिसे ‘राजा’ कहा जाता था.
- केंद्रीय समिति: राज्य की वास्तविक शक्ति एक केन्द्रीय समिति के पास होती थी जिसमें जनता के प्रतिनिधि होते थे. उदाहरण के लिए, लिच्छवी गणराज्य की केन्द्रीय समिति में 1707 राजा प्रतिनिधि थे.
- निर्णय प्रक्रिया: सभी प्रकार के निर्णय बहुमत के आधार पर लिए जाते थे, जिससे यह स्पष्ट होता है कि बुद्धकालीन गणराज्यों में शासकों का चुनाव होता था.
- आधुनिक विश्व में लोकतंत्र का विस्तार
- प्रारम्भिक चरण: आधुनिक विश्व में लोकतंत्र की स्थापना और विस्तार की शुरुआत सन् 1789 ई. की फ्रांसीसी क्रांति से मानी जाती है.
- प्रमुख क्रांतियाँ और उनका प्रभाव
- फ्रांसीसी क्रांति (1789): इस क्रांति ने स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व के तत्वों को स्थापित किया, हालाँकि यहाँ लोकतंत्र बार-बार उखाड़ा और फिर स्थापित किया गया।
- ब्रिटेन की गौरवपूर्ण क्रांति (1688): इसके बाद ब्रिटेन में लोकतंत्र ने धीरे-धीरे अपने पैर जमाने शुरू किए और राजशाही की शक्तियाँ कम होने लगीं।
- अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम: अमेरिकी नागरिकों ने 1776 ई. में ब्रिटिश हुकूमत को उखाड़ फेंका और 1789 ई. में एक लोकतांत्रिक संविधान लागू किया, जो आज भी वहां कार्यरत है।