1. (क) प्राकृतिक संसाधन
Table of Contents
भूमि संसाधन
- भूमि प्राकृतिक संसाधन है |
- कृषि वानिकी, पशुचारण, मत्स्य, खनन, वन्य, जीवन, परिवहन, संचार, जैसे आर्थिक क्रियाएं भूमि पर सम्पन्न होने के कारण यह मौलिक संसाधन है |
- भारत में भूमि का भौतिक स्वरूप
- (i) मैदान – 43%
- (ii) पर्वत – 30%
- (iii) पठार – 27%
- मैदान कृषि एवं उद्योगों के लिए उपयोगी है |
- पर्वत बारहमासी नदियों के प्रवाह को सुनिश्चित करते हुए पर्यटन विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ मुहैया करती है |
- पठार में खनिज, जीवाश्म ईंधन एवं वन संपदा के कोष संचित है |
- असंगठित पदार्थों से निर्मित पृथ्वी की सबसे ऊपरी पतली परत मृदा कहलाती है |
- चट्टानों के टूटने फूटने तथा भौतिक रासायनिक और जैविक परिवर्तन से मृदा का निर्माण होता है |
- मृदा परितंत्र का एक महत्वपूर्ण घटक है |
- मृदा नवीकरणीय प्राकृतिक संसाधन है |
मृदा निर्माण के कारक
प्राकृतिक संसाधन
- उच्चावचन या धाराकृति
- मूल शैल या चट्टान
- जलवायु
- वनस्पति
- जैव पदार्थ
- खनिज कण
- समय

प्राकृतिक संसाधन Class 10th Geography Chapter 01
मृदा 6 प्रकार के होते है :-
- i. जलोढ़ मृदा
- ii. काली मृदा
- iii. लाल एवं पीली मृदा
- iv. लेटराइट मृदा
- v. मरुस्थलीय मृदा
- vi. पर्वतीय मृदा
जलोढ़ मृदा प्राकृतिक संसाधन
- नदियों द्वारा बहाकर लाए गये मृदा को जलोढ़ मृदा कहते है |
- जलोढ़ मिट्टी का गठन बालू, सिल्ट एवं मृत्तिका के विभिन्न अनुपात से होता है|
- जलोढ़ मिट्टी का रंग धुंधला से लेकर लालीमा लिए भूरे रंग का होता है |
जलोढ़ मृदा दो प्रकार के होते है :-
(i) बांगार – पुराने जलोढ़ मृदा को बांगर कहा जाता है | पुराने जलोढ़ मृदा में कंकर एवं बजरी की मात्रा अधिक होती है |
(ii) खादर – नवीन जलोढ़ मृदा को खादर कहा जाता है | खादर में बालू एवं मृतका का मिश्रण होता है |
- जलोढ़ मृदा में पोटाश, फास्फोरस और चूना जैसे तत्वों की प्रधानता होती है ; जबकि इसमें नाइट्रोजन एवं जैव पदार्थ की कमी रहती है |
- जलोढ़ मृदा गन्ना, चावल, गेहूं, मक्का, दलहन जैसे – फसलों के लिए उपयुक्त मानी जाती हैं |
- भारत में 6.4 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र पर जलोढ़ मृदा है |
- उत्तर भारत का मैदान जलोढ़ निर्मित है, जो हिमालय की तीन महत्वपूर्ण नदि प्रणालियों सिन्धु, गंगा और ब्रह्मपुत्र द्वारा लाए गये जलोढ़ के निक्षेप से बना है |
- राजस्थान एवं गुजरात में भी संकरी पट्टी के रूप में इस मृदा का प्रसार है |
काली मिट्टी
- काली मिट्टी का रंग काला एल्युमिनियम एवं लौह यौगिक के उपस्थित के कारण होता है |
- काली मिट्टी कपास की खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है इसीलिए इसे काली कपास मृदा के नाम से जाना जाता है |
- भारत में 6.4 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर काली मिट्टी फैली हुई है |
- काली मिट्टी को रेगुड़ मिट्टी भी कहा जाता है |
- काली मृदा में कैल्शियम कार्बोनेट, पोटाश और चूना अधिक मात्रा में पाई जाती है |
- काली मिट्टी में फास्फोरस की कमी रहती है |
- काली मिट्टी महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु राज्यों में विस्तृत है |
- काली मिट्टी कपास, गन्ना, प्याज, गेहूं एवं फलों की खेती के लिए अनुकूल मानी जाती है |
- लाल एवं पीली मृदा मिट्टी में लोहांश की उपस्थिति के कारण इसका रंग लाल होता है |
- लाल मिट्टी में जलयोजन के पश्चात रंग पीला हो जाता है
- लाल मिट्टी भारत में 7.2 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर पाया जाता है |
- लाल एवं पीली मिट्टी तमिलनाडु, कर्नाटक, गोवा दक्षिण पूर्वी महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, छोटा नागपुर पठार एवं मेघालय पठार के क्षेत्र में है |
लैटेराइट मृदा
- लैटेराइट शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के ‘लैटर’ के शब्द से हुआ है जिसका शाब्दिक अर्थ ‘ईंट’ होता है |
- भारत में लैटेराइट मृदा का विस्तार 1.3 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर है |
- एल्युमिनियम और लोहे के ऑक्साइड के कारण इसका रंग लाल होता है |
- लैटेराइट मिट्टी में ह्यूमस की मात्रा नगण्य होती है |
- लैटेराइट मिट्टी कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, उड़ीसा तथा असम में मिलता है |
- कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में लैटेराइट मृदा में चाय एवं कहवा का उत्पादन किया जाता है |
- तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश और केरल में लैटेराइट मिट्टी काजू की खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है |
प्राकृतिक संसाधन Class 10th Geography Chapter 01
मरुस्थलीय मृदा
- मरुस्थलीय मृदा शुष्क ऋतू, अल्प वर्षा, ह्यूमस रहित बालू मिट्टी वाले क्षेत्रों में विकसित होती है|
- मरुस्थलीय मृदा का रंग लाल या हल्का भूरा होता है |
- मरुस्थलीय मृदा पंजाब, राजस्थान, सौराष्ट्र, कच्छ, पश्चिमी हरियाणा और दक्षिणी पंजाब में पायी जाती है |
- मरुस्थलीय मृदा में वनस्पति और उर्वरक का अभाव पाया जाता है।
- मरुस्थलीय मृदा में सिंचाई की व्यवस्था कर कपास, चावल, गेहूं, का भी उत्पादन किया जा सकता है।
पर्वतीय मृदा
- पर्वतीय मृदा पर्वतीय और पहाड़ी क्षेत्रों में देखने को मिलता है।
- पर्वतीय मृदा के ढलानों पर फलों के बागान एवं नदी घाटी में चावल का लगभग सभी क्षेत्रों में उत्पादन किया जाता है।
भूमि उपयोग को निम्न वर्ग में बाँटा गया है:-
- वन विस्तार
- कृषि अयोग्य बंजर भूमि
- गैर कृषि कार्य में संलग्न भूमि
- स्थायी चारागाह एवं गोचर भूमि
- बाग बगीचे एवं उपवन में संलग्न भूमि
- कृषि योग्य बंजर भूमि जिसका प्रयोग 5 वर्ष से न हुआ हो
- वर्तमान परती भूमि
- वर्तमान परती भूमि के अतिरिक्त वह परती भूमि जहाँ 5 वर्ष से खेती न हुआ हो
- शुद्ध बोया गई भूमि
भूमि उपयोग के दो प्रमुख कारक निर्धारित करते है:-
- भौतिक कारक – भू-आकृति, जलवायु तथा मृदा
- मानवीय कारक – जनसंख्या घनत्व, प्रौद्योगिकी क्षमता, संस्कृति एवं परंपरा
भूमि से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य :-
- भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र 32.8 लाख वर्ग किलोमीटर के मात्र 93% भाग ही भूमि उपयोग का आंकड़ा उपलब्ध है | जम्मू-कश्मीर में पाक अधिकृत तथा चीन अधिकृत भूमि का सर्वेक्षण नहीं हो पाया है |
- भारत के कुल क्षेत्र का 54% भूमि कृषि योग्य है |
- पंजाब एवं हरियाणा में कुल भूमि के 80% भाग पर खेती होती है जबकि अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मणिपुर एवं अंडमान निकोबार द्वीप समूह में 10% से भी कम क्षेत्र में खेती होती है |
- किसी भी देश में पर्यावरण संतुलित रखने के लिए उनके क्षेत्र के 33% भू-भाग पर वन विस्तार वांछित है |
- वर्तमान में 20% भू-भाग पर वन विस्तार है |
- राष्ट्रीय वन नीति 1952 में बनाया गया|
भू- क्षरण
- मृदा को अपने स्थान से विविध क्रियाओं द्वारा स्थानांतरित होना भू-क्षरण कहलाता है |
- गुरुत्व बल के प्रभाव से उद्योग से निकले वाले अपशिष्ट पदार्थ विविध प्राकृतिक कारकों जैसे – गतिशील जल, पवन, हिमानी और सामुद्रिक लहरों के द्वारा मानवीय अनुक्रिया जैसे – वनोन्मूलन, अति पशुचारण, अधिक सिंचाई, खनन, रसायनों का अत्यधिक उपयोग के कारण|
नोट –
- खनन के उपरांत उस स्थान का खाइयों एवं मलबों के साथ खुला छोड़ देने के कारण झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में भूमि निम्नीकरण हुआ है |
- उड़ीसा में वनोन्मूलन के कारण भूमि निम्नीकरण हुआ है
- गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे-राज्यों में अति पशुचारण ने भूमि के स्तर को कुप्रभावित किया है |

भू – संरक्षण
- मिट्टी के कटाव को रोकना तथा मिट्टी के उत्पादकता को बढ़ाना भू – संरक्षण कहलाता है |
भू – संरक्षण के उपाय :-
- फसल चक्र के द्वारा
- पहाड़ी क्षेत्रों में समोच्च जुताई के द्वारा
- पवन अपरदन वाले क्षेत्रों में पट्टिका कृषि के द्वारा
- रसायन का उचित उपयोग के द्वारा
- जलक्रांतता – अति सिंचाई के कारण भूमि में अत्यधिक जल का जमा होना जलक्रांतता कहलाता है |
समोच्च जुताई
- पहाड़ी क्षेत्रों में अपरदन को रोकने के लिए खेत की जुताई वृताकार रूप में की जाती है, इसे ही समोच्च जुताई कहते है |
पट्टिका कृषि
- पवन अपरदन वालें क्षेत्रों में फसलों के बीच घास की पट्टिका विकसित करना पट्टिका कृषि कहलाती है |
- दो खाद्यान्न फसलों के बीच दलहन या तिलहन का फसल लगाना फसल चक्र कहलाता है | इससे नाइट्रोजन का स्थिरीकरण होता हैं |
वस्तुनिष्ठ प्रश्न
- पंजाब में भूमि निम्नीकरण का मुख्य कारण है :
उत्तर- अधिक सिंचाई
- सोपानी कृषि किस राज्य में प्रचलित है ?
उत्तर- उत्तराखंड
- मरुस्थलीय मृदा का विस्तार निम्न में कहाँ है ?
उत्तर- राजस्थान
- मेढ़क के प्रजनन को नष्ट करने वाला रसायन कौन है ?
उत्तर- एंड्रिन
- काली मृदा का दूसरा नाम क्या है ?
उत्तर- रेगुर मृदा
- निम्न में पुरानी जलोढ़ मिट्टी कौन है?
उत्तर- बांगर
- निम्न में से कौन मृदा निर्माण का कारक है?
उत्तर- इनमें से सभी
- काली मिट्टी कहाँ पाई जाती है? [2024A1]
उत्तर- झारखण्ड
- निम्न में से किसे नवीन जलोढ़ मिट्टी कहा जाता है?
उत्तर- खादर
- रेगुर किसे कहते हैं? [2024AII]
उत्तर- काली मिट्टी
- मेढ़क को प्रजनन प्रक्रिया को बाधित करने वाला रसायन कौन-सा है? [2018AII]
उत्तर- एंड्रिन
- भारत में पहाड़ों से भरी भूमि कितना प्रतिशत है?
उत्तर- 30
- मरुस्थलीय मृदा का विस्तार निम्न में से कहाँ है?
उत्तर- राजस्थान
- प्रायद्वीपीय भारत की नदी घाटियों में कौन-सी मिट्टी मिलती है?
उत्तर- जलोढ़ मिट्टी
प्राकृतिक संसाधन Class 10th Geography Chapter 01
- भारत में सबसे अधिक विस्तार किस मिट्टी का है?
उत्तर- जलोढ़ मिट्टी
- पुरानी जलोढ़ मिट्टी को क्या कहा जाता है?
उत्तर- बाँगर
- लेटेराइट मृदा का रंग होता है?
उत्तर- लाल
- भारत की सबसे उपजाऊ मिट्टी है-
उत्तर- जलोढ़ मिट्टी
- काली मिट्टी उपयुक्त है- [2019AII]
उत्तर- कपास के लिए
- इनमें से किस राज्य में काली मृदा पाई जाती है?
उत्तर- महाराष्ट्र

प्राकृतिक संसाधन
लघु उत्तरीय प्रश्न
- जलोढ़ मृदा के विस्तार वाले राज्य का नाम बतावें | इस में कौन सी फसलें लगाई जा सकती है ? [2018AI]
उत्तर :- जलोढ़ मृदा के विस्तार वाले राज्य हैं :- उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, पश्चिम बंगाल तथा असम | इस मृदा में गन्ना, चावल, मक्का, दलहन जैसी फसलें उगाई जा सकती है |
- समोच्च कृषि से आप क्या समझते है ?
उत्तर :- पहाड़ी क्षेत्रों में मृदा अपरदन को रोकने के लिए वृताकार का रूप में खेत की जुताई की जाती है | इसे ही समोच्च कृषि के नाम से जाना जाता है |
- पवन अपरदन वाले क्षेत्र में कृषि की कौन सी पद्धति उपयोगी मानी जाती है ? [2021AI]
उत्तर :- पवन अपरदन वाले क्षेत्र में पट्टिका पद्धति उपयोगी मानी जाती है | इस कृषि में फसलों के बीच घास की पट्टियां लगाई जाती है |
- भारत के किन भागों में नदी डेल्टा का विकास हुआ ? यहां की मृदा की क्या विशेषता है |
उत्तर :- भारत के पूर्वी तटीय मैदान में महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदी द्वारा डेल्टा का निर्माण होता है | यहां जलोढ़ मिट्टी पाई जाती है | यह काफी उपजाऊ होती है |
- फसल चक्रण मृदा संरक्षण में किस प्रकार सहायक है ? [2022AII]
उत्तर :- फसल चक्रण के द्वारा मृदा के पोषण स्तर को बरकरार रखा जा सकता है | गेहूं, चावल, मक्का, आलू के लगातार उगाने से मृदा के पोषक तत्व में कमी हो जाती है | इसे तिलहन एवं दलहन की खेती से पुनः प्राप्त किया जा सकता है| इसे नाइट्रोजन का स्थिरीकरण होता है | फसल चक्रण से मृदा संरक्षण में मदद मिलती है |
- मृदा निर्माण के कारकों का उल्लेख करें | [2019C]
उत्तर:- मृदा निर्माण के कारक निम्नलिखित हैं:-
i. उच्चावचन या धाराकृति
ii. मूल शैल या चट्टान
iii. जलवायु
iv. वनस्पति
v. जैव पदार्थ
vi खनिज कण
प्राकृतिक संसाधन Class 10th Geography Chapter 01
- जलोढ़ मृदा से आप क्या समझते हैं ?इस मृदा में कौन सी फसल उगाई जाती है? [2017AII]
उत्तर:- नदियों द्वारा बहाकर लाए गये मृदा को जलोढ़ मृदा कहते है| जलोढ़ मृदा गन्ना, चावल, गेहूं, मक्का, दलहन जैसे – फसलों के लिए उपयुक्त मानी जाती हैं |
- खादर और बांगर मिट्टी में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:-
- बांगर – पुराने जलोढ़ मृदा को बांगर कहा जाता है | पुराने जलोढ़ मृदा में कंकर एवं बजरी की मात्रा अधिक होती है |
- खादर – नवीन जलोढ़ मृदा को खादर कहा जाता है | खादर में बालू एवं मृतका का मिश्रण होता है |
- डेल्टाई मृदा की विशेषताएं लिखिए। [2024AI]
उत्तर:- नदियों द्वारा बहाकर लाए गये मृदा को जलोढ़ या डेल्टाई मृदा कहते है | पूर्वी तटीय मैदान स्थित महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों द्वारा निर्मित डेल्टा का निर्माण जलोढ़ से ही जुड़ा है | जलोढ़ मिट्टी का गठन बालू, सिल्ट एवं मृत्तिका के विभिन्न अनुपात से होता है| जलोढ़ मृदा गन्ना, चावल, गेहूं, मक्का, दलहन जैसे – फसलों के लिए उपयुक्त मानी जाती हैं |
- लेटेराइट मृदा कहां पाई जाती है ? इस मृदा में कौन फसलें उपजाई जाती है? [2023AII]
उत्तर:- लेटेराइट मिट्टी कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, उड़ीसा तथा असम में मिलता है | कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में लेटेराइट मृदा में चाय एवं कहवा का उत्पादन किया जाता है | तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल में लेटेराइट मिट्टी काजू की खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है |
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
- जलक्रांतता कैसे उपस्थित होता है ? मृदा अपरदन में इसकी क्या भूमिका है ?
उत्तर :- अधिक सिंचाई के कारण जलक्रांतता की समस्या उपस्थित होता है जिससे मृदा में लवणीय और क्षारीय गुण बढ़ जाता है जो भूमि के निम्नीकरण के लिए उत्तरदायी है | पंजाब, हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश में अधिक सिंचाई से भूमि का निम्नीकरण हुआ है |
- मृदा संरक्षण पर एक निबंध लिखिए |
उत्तर :- मृदा प्रकृति का एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है | यह न केवल पौधों का विकास करती है बल्कि धरती पर के विविध प्रकार के प्राणियों को भोजन प्रदान कर जिन्दा भी रखती है | इसके नष्ट होने से प्रकृति की एक बहुमूल्य शक्ति समाप्त हो जाएगी | इसलिए इसका संरक्षण जरूरी है |
वनोन्मूलन, अति पशुचारण, खनन, रसायनों का अत्यधिक उपयोग के कारण से भूमि का निम्नीकरण हुआ | भूमि का निम्नीकरण आधुनिक मानव सभ्यता के लिए एक विकट समस्या है इसका संरक्षण हमारे लिए चुनौती है | फसल चक्रण, समोच्च जुताई, पट्टिका कृषि, रसायन का उचित उपयोग, वृक्षारोपण के द्वारा मृदा संरक्षण किया जा सकता है |
प्राकृतिक संसाधन Class 10th Geography Chapter 01
- भारत में अत्यधिक पशुधन होने के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था में इसका योगदान लगभग नगण्य हैं | स्पष्ट करें |
उत्तर :- भारत पशुधन के मामले में विश्व के अग्रणी देशों में शामिल किया जाता है किन्तु स्थाई चारागाह के लिए बहुत कम भूमि उपलब्ध है जो पशुधन के लिए पर्याप्त नहीं है | इसीलिए भारत में अत्यधिक पशुधन होने के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था में इसका योगदान लगभग नगण्य है |
- जलोढ़ मृदा की विशेषताओं का एक संक्षिप्त विवरण दीजिए। [2024AI]
उत्तर:- जलोढ़ मृदा के विशेषताएं:- नदियों द्वारा बहाकर लाए गये मृदा को जलोढ़ मृदा कहते है | भारत में 6.4 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र पर जलोढ़ मर्दा है
जलोढ़ मृदा दो प्रकार के होते हैं:-
(i) बांगर – पुराने जलोढ़ मृदा को बांगर कहा जाता है | पुराने जलोढ़ मृदा में कंकर एवं बजरी की मात्रा अधिक होती है|
(ii) खादर – नवीन जलोढ़ मृदा को खादर कहा जाता है | खादर में बालू एवं मृतका का मिश्रण होता है |
जलोढ़ मिट्टी का गठन बालू, सिल्ट एवं मृत्तिका के विभिन्न अनुपात से होता है| जलोढ़ मिट्टी का रंग धुंधला से लेकर लालीमा लिए भूरे रंग का होता है | जलोढ़ मृदा में पोटाश, फास्फोरस और चुना जैसे तत्वों की प्रधानता होती है ; जबकि इसमें नाइट्रोजन एवं जैव पदार्थ की कमी रहती है | जलोढ़ मृदा गन्ना, चावल, गेहूं, मक्का, दलहन जैसे – फसलों के लिए उपयुक्त मानी जाती हैं |
उत्तर भारत का मैदान जलोढ़ निर्मित है, जो हिमालय की तीन महत्वपूर्ण नदि प्रणालियों सिन्धु, गंगा और ब्रह्मपुत्र द्वारा लाए गये जलोढ़ के निक्षेप से बना है | राजस्थान एवं गुजरात में भी संकरी पट्टी के रूप में इस मृदा का प्रसार है |पूर्वी तटीय मैदान स्थित महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों द्वारा निर्मित डेल्टा का निर्माण जलोढ़ से ही जुड़ा है |